रक्षा बंधन पर राजा बलि को याद किया जाता है, क्योंकि राजा बलि का इस पर्व से बेहद खास संबंध रहा है। रक्षा बंधन के पावन पर्व पर राजा बलि का उदाहरण दिया जाता है। कहा जाता है कि लक्ष्मी जी ने विष्णु जी को रक्षा सूत्र बांधकर उन्हें अपना भाई बनाया। इतना ही नहीं माता लक्ष्मी उपहार स्वरुप भगवान विष्णु को राजा बलि के पास ले गए। शास्त्रों की मान्यताओं के अनुसार रक्षा बंधन पर राजा बलि की कथा का संबंध पौराणिक है।
कहते हैं कि एक सौ 100 यज्ञ पूर्ण कर लेने पर दानवेन्द्र राजा बलि के मन में स्वर्ग का प्राप्ति की इच्छा बलवती हो गई तो का सिंहासन डोलने लगा। इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की। भगवान ने वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर लिया और राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुँच गए। उन्होंने बलि से तीन पग भूमि भिक्षा में मांग ली। बलि के गु्रु शुक्रदेव ने ब्राह्मण रुप धारण किए हुए विष्णु को पहचान लिया।
बलि को इस बारे में सावधान कर दिया किंतु दानवेन्द्र राजा बलि अपने वचन से न फिरे और तीन पग भूमि दान कर दी। वामन रूप में भगवान ने एक पग में स्वर्ग और दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लिया। तीसरा पैर कहाँ रखें? बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। यदि वह अपना वचन नहीं निभाता तो अधर्म होता। आखिरकार उसने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया और कहा तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए।
वामन भगवान ने वैसा ही किया। पैर रखते ही वह रसातल लोक में पहुँच गया। जब बलि रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया और भगवान विष्णु को उनका द्वारपाल बनना पड़ा। भगवान के रसातल निवास से परेशान लक्ष्मी जी ने सोचा कि यदि स्वामी रसातल में द्वारपाल बन कर निवास करेंगे तो बैकुंठ लोक का क्या होगा? इस समस्या के समाधान के लिए लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय सुझाया।
लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षा बन्धन बांधकर अपना भाई बनाया और उपहार स्वरुप अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ ले आयीं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी तथा रक्षा-बंधन मनाया जाने लगा।